(एक और परिप्रेक्ष्य में -)
सुनो!सुनो!सुनो!
कहानी सुनो!
एक की नहीं,दो की नहीं,
अनेक बेटियों की
सुनो!सुनो!सुनो!
(सामूहिक -पुरुष )
हमारे तुम्हारे
कितने भी मतभेद है
पर इस बात पर
हम सब एक है
कि हमारी जो संस्कृति है,
वह सबसे महान है,
उसमे नारी का ऊँचा स्थान है।
बोलो!बोलो! है न!
हाँ!हाँ!
वह घर की लक्ष्मी है,
उसका काम है,वह घर संभाले
चार दीवारी के भीतर फैलाए उजाले
घर उसकी मर्यादा रेखा है
घर उसकी मर्यादा रेखा है।
(सामूहिक -लडकियाँ )
पर क्या आपने देखा है?
मर्दों की भी कोई सीमा-रेखा है?
क्यों बेटियाँ ही हर दुःख सहें ?
क्यों कुरीतियों की बलि चदे ?
जब सुख और दुःख में
जीवन और मरण में,
हमारा बराबरी का हिस्सा है
तो फिर भेद-भाव का क्या किस्सा है?
(कुछ लडकियाँ आगे आकर )
हाँ!हाँ!भेद-भाव का क्या किस्सा है?
क्यों?बेटी होने का बोझ
हमें आज भी सालता है
मेरा ही घर मुझे आज क्यों काटता है?
क्यों?अपने ही घर में आज असुरक्षित हूँ,
एक पल जीने के लिए,
पल-पल तरसती हूँ।
(सुना आपने ! सुना आपने)
कल तो हद हो गई,
एक और बेटी दरिंदों
का शिकार हो गई।
(सामूहिक )-
देश हुआ शर्मसार
बेटियों पर हो रहे अत्याचार
16 दिसंबर की वो काली रात
जब फिर एक बेटी ने गंवाई अपनी जान .....
कब तक नारी अपमान सहे ?
ज़िल्लत की ज़िन्दगी जिए
अपना हक़ पाने के लिए
जीवन से लड़कर मरे
इसलिए अब और भी जरुरी है
लानी हमें बराबरी है
लानी है हमें समता
वरना ढूंढते रह जाओगे
प्यार,स्नेह और ममता
जब समाज ही बंधन गढ़े
सरकार का मुँह बंद रहे
तब सही कानून ,सही तरीके से
,हित में लागू कौन करे?
बंद करनी होगी अब पुरुषो को ,अपनी मनमानी
नहीं सहेंगी बेटियाँ अब उनकी तानाशाही
क्या पहनना है?कैसे पहनना है?
क्या गाना है ,क्या बजाना है?
ये वो निर्धारित करेंगे
हमसे हमारे जीने के अंदाज़ छीन लेंगे
कहते है गाना बजाना बंद करो,नहीं तो
मार डालेंगे!
हमे डर इस बात का नहीं है
कि हममे कम शक्ति है
हमें अपने अन्दर का प्रकाश डराता है
जहाँ से तुम्हारा वजूद बौना नज़र आता है।
हम कहते है -
बात हाथ से न निकल जाए
बेहतर है कि संभल जाए
प्यार,इंसानियत और बराबरी
से रहना सीख जाएं
इतिहास स्वयं को दोहराता है
ग़ुलाम बनाने वाला
खुद ग़ुलाम बन जाता है!!!
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