बच्चा जब छोटा होता है, सीख माँ देती है। बड़ा होता है तो घर परिवार आस-पड़ोस (कल्चर-संस्कृति) से सीखता है। जब विद्यालय जाता है तो गुरु की सीख उसका मार्गदर्शन करती है, यदि बच्चा माता-पिता या गुरु की सीख को अपना आदर्श मानकर उनके बताये पदचिन्हों पर चलता है तो निसंदेह उसका जीवन सफल हो जाता है। वहीं दूसरी ओर यदि वो बुरी संगत या बुरे व्यक्तित्व से प्रभावित हो गया तो ज़रा भी देर नहीं लगती उसके लिए बड़ो का मान-सम्मान,आदर-सत्कार जैसे शब्द बेईमानी हो जाते है और वह गर्त में गिरता जाता है इसलिए बच्चो को चाहिए कि वो अपने बड़ो की इज्ज़त करे, शिष्टाचार का सही अर्थ समझे क्योंकि ............बड़े कभी बच्चो का बुरा नहीं सोचते उनकी आँखों में हमेशा बच्चो के सुन्दर भविष्य का सपना होता है।
इसलिए बच्चो को चाहिए की वे बड़ो की दी सीख को अपनाये। गुरु की सीख को आदर्श माने और माँ पिता की सीख को जीवन में उतार कर न केवल संस्कारवान बने बल्कि चरित्रवान बने।
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