अक्सर मेरे साथ कुछ एसा होता है जैसा शायद आपके साथ भी होता हो या न भी होता हो ,
पर मेरे साथ तो जरुर होता है हम जो भी कहते है उसे समझने वाले कुछ और समझ लेते है और उसका सन्दर्भ -
प्रसंग अलग करके मतलब कुछ और ही निकाल लेते है और हम जो कहना चाहते है हो कुछ और जाता है है और "बन जाता है
बिन बात का बतंगड़ " आजकल भावनाओ को कोई समझता ही नहीं | अब लोगो को कैसे समझाए की अगर उनकी समझ और इनकी समझ
हमारी समझ और तुमाहरी समझ एक होती तो लाइफ इतनी बोरिंग नहोती ,इसीलिये शायद किसी ने कहा होगा की समझ समझ से समझ को
समझो समझ समझ ही खुद एक समझ है ,समझ समझ को जो न समझे मेरी समझ में वो नासमझ है
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