रात थी घनेरी
सड़क थी अँधेरी
नहीं थी अकेली।
साथ था मित्र
बिलकुल सच्चरित्र
समझ कर हालात
बोला-
ना डर
मै हूँ तेरे साथ
तभी आवाज़ आयी
बहन क्यों हो घबराई ?
तुम्हे जहाँ जाना है
हमें भी वहीँ जाना है।
वह बैठ गई विश्वास पर
स्वयं की ही लाश पर
उसमे थे दरिन्दे,
गिद्ध नुमा परिंदे ।
नियत थी उनकी खोटी
नोंचने लगे उसकी बोटी
उलझ रही थी सांसे
तार-तार थी पोशाके
अश्रु लहु ,लहु अश्रु,
जीवन की गुहार
ईश्वर से पुकार
मदद मदद
वह चिल्लाई-
कही से कोई आवाज़ न आई
सब थे गूंगे बहरे
साथ थी उसकी किस्मत
लुटी हुई अस्मत
केश थे खुले
अरमाँ थे मरे
धड़कन थी,पर चाह नहीं
जीवन था पर आत्मा नहीं
जो लड़ते- लड़ते मर गई
कह दिया शहीद हो गई
हे देश! कैसा है तेरा परिवेश?
जो जीना चाहता है,
वो लड़कर मर जाता है।
और मरकर भी नाम अमर कर जाता है!!
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