जब तुम अनुभव करते हो 'तुम कोई नहीं'तब तुम अनुभव करते हो 'तुम कुछ नहीं',जब तुम अनुभव करते हो तुम कुछ नहीं, तभी तुम्हे लगता है कि अभी तुममे कुछ बाकी है जानने और सीखने के लिए। तब तुम देखते हो और सोचते हो कि धीरे-धीरे सब कुछ सरल और सहज हो जाता है खुद को जानने और समझने के लिए।तब तुम धीरे-धीरे सब कुछ सीखने लगते हो।अज्ञान के अंधकार से निकल कर ज्ञान के प्रकाश की ओर अग्रसर होने लगते हो और तभी अचानक से पर्त दर पर्त कुछ खुलता जाता है ठीक वैसे ही जैसे गहन उदासी के बाद ख़ुशी की कोई किरण दिख जाये या यूँ कह लीजिये की कई दिनों की घोर मूसलाधार बारिश के बाद सूर्य भगवान के दर्शन हो जाए, या घना कोहरा छंट जाये। मन मस्तिष्क के द्वार कुछ उसी प्रकार खुल जाते है और तब तुम अनुभव करने लगते हो की 'तुम कुछ हो'। हाँ! यह भी हो सकता है कि कभी कोई नकारात्मक विचार तुम पर प्रभा-हो जाये और तुम स्वयं को उसकी गिरफ्त में पाकर असहाय महसूस करो लेकिन याद रखो जैसे दिन के बाद रात और
रात के बाद दिन आता है वैसे ही सकारात्मक सोंच तुम्हें स्वयं प्रेरित करती है आगे बढ़ने के लिए और तभी सब कुछ सुलभ हो जाता है।तब तुम अनुभव करते हो की जैसेकोई तुम्हारा भाग्य खट खटा रहा हो। अनुभव
बहुत सुंदर
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