Monday, November 29, 2010

अक्सर

अक्सर मेरे साथ कुछ एसा होता है जैसा शायद आपके साथ भी होता हो या न भी होता हो ,
पर मेरे साथ तो जरुर होता है हम जो भी कहते है उसे समझने वाले कुछ और समझ लेते है और उसका सन्दर्भ -
प्रसंग अलग करके मतलब कुछ और ही निकाल लेते है और हम जो कहना चाहते है हो कुछ और जाता है है और "बन जाता है
बिन बात का बतंगड़ " आजकल भावनाओ को कोई समझता ही नहीं | अब लोगो को कैसे समझाए की अगर उनकी समझ और इनकी समझ
हमारी समझ और तुमाहरी समझ एक होती तो लाइफ इतनी बोरिंग नहोती ,इसीलिये शायद किसी ने कहा होगा की समझ समझ से समझ को
समझो समझ समझ ही खुद एक समझ है ,समझ समझ को जो न समझे मेरी समझ में वो नासमझ है

Saturday, November 27, 2010

चहरे

अजी हमने कही और आपने सुनी, सुनी तो ठीक और न सुनी तो भी ठीक,
और वैसे भी" हम आपके है कौन"? अगर आप भी गांधी जी के बन्दर के एक ख़ास बन्दर है, जो सुनता नहीं तो कोई बात नहीं, कम स कम पढ़ ही लीजिये
हम तो जनाब बहुत पढ़ते है नहीं पढ़ पाते तो एक चीज़ नहीं पढ़ पाते | अरे! आपने पूछा नहीं क्या ? तो लीजिये जनाब हम खुद ही बता देते है
चेहरा हाँ जी चेहरा
अगर चेहरा पढना जानते तो फसबुक पर समय जाया क्यों करते? अब ये न पूछिएगा की हमने ऐसी क्यों कही पर खुदा कसम जो भी कही सौ फीसदी सच्ची
कही क्योकि जितनी जल्दी गिल्गितान भी रंग नहीं बदलता होगा ये अपना ढंग भी बदल लेते है और तो और जीने का ढंग भी बदल लेते है | तिलक ये जब भी
लगाते है माथा देख कर ही लगाते वरना लगाते ही नहीं| अपने बचपने में वर्णमाला सीखते समय इनोहने स-से -सच कभी नहीं सीखा होगा ये बात हम दावे के साथ
कह सकते है |कहने को तो बहुत ही सीधे साधे तरीके से हम ये "फ़िल्मी गाना की एक ----------- पर कई ----------- लगा लेते है लोग | गा कर भी अपनी भडास
निकल सकते थे पर क्या करे पढने से मजबूर है शायद इसीलिये लिखने से भी इसलिए आपके लिए भी होमवर्क छोड़ जाते है की ऊपर लिखी पंक्तियों में सही शब्द
भरो |

Tuesday, November 23, 2010

खेल-खेल-में..

खेल-कूद प्रतियोगिता यानि-स्पोर्ट्स-डे-यानि मनोरंजन का एक स्वस्थ साधन या व्यायाम -व्यायाम और खेल-कूद आपस में कितने सम्बंधित है,यह बात तो सभी जानते है,परन्तु एक बात समझनी है क्या वास्तव में व्यायाम करते वक़्त हम खेलते है? या प्रतियोगिता करते समय हम स्वस्थ होते है? और एक बात मेरे जहन में आती है वो यह कि स्वस्थ रहेने और मनोरंजन करने या खेलने -कूदने का यदि घनिष्ठत रिश्ता है
तो यह जानना जरुरी है कि यह "यह रिश्ता क्या कहलाता है?" केवल मनोरंजन या व्यायाम या खेल-कूद क्या??? हाँ मुझे लगता है कि अगर इनमे से प्रतियोगिता शब्द को हटा दें तो यह मनोरंजन का साधन हो सकता है| एक दूसरी बात और है और वो यह है कि प्रतियोगिता क्या है? और क्यों बनी? और बात- बात पर प्रतियोगिता?? चाहे वाद-विवाद प्रतियोगिता हो या काव्य-पाठ प्रतियोगिता हो या वार्षिक खेल-कूद प्रतियोगिता हो | इस प्रतियोगिता ने तो प्राण ही ले लिए मनोरंजन तो गया प्रतियोगिता करने ,अब कहे का खेल और कहे का कूद? इस प्रतियोगिता संस्कृति ने पारिवारिक प्रथा को तोड़ा हा? क्यों कासी कही???

Saturday, November 20, 2010

taza khabar

अभी अभी ऍफ़ एम् पर गाना बज रहा था "जोर का झटका हाई जोरों से लगा" गाना बहुत अच्छा है और सुन कर झटका तो लगता है पर जोर से नहीं| मुझे याद है कुछ इसी तरह का एक और गाना पहले खूब चला
था "जोर का झटका हाई धीरे से लगा" मै दोनों गानों का मूल्यांकन करती हूँ तो पाती हूँ की जोर झटका धीरे से ही लगता है, क्योंकि जोर का झटका अगर जोरों से लगता होता तो कुछ वैसा नहीं होता जैसा बताया गया है|" सब कुछ करने के बाद जब जागे तो काहे का झटका और काहे का जोर" यह थी आज की ताज़ा खबर

Tuesday, November 16, 2010

ALFAAZ

मुद्दतों बाद आज मेरे अलफ़ाज़ जागे है, दिल में कुछ कहने के बहाने जागे है!
क्या हुआ जो देर से आये जब जागे है ,दुरुस्त ही जागे है!!
प्यारे मित्रों !
एक बार फिर आप सभी पाठकों को मेरा सलाम|
"जागो ग्राहक जागो" "जब जागो तभी सवेरा" "तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग ज़रा"
और भी न जाने कितने जुमले, कहावते, इत्यादि है| हम पढ़ते है, पढ़ाते है , जानते है और जनाते है लेकिन फिर भी अपनी आदत से बाज़ नहीं आते है|
हमने तो जैसे ठान ली है न जागे है, न जागेंगे, और न जागने देंगे,क्योंकि मेरा मानना ही की अगर जाग गए तो सारे अरमान भी जाग जायेंगे| बिला वजह की चिंता फिकर और वैसे भी जागने से क्या फायेदा?
जहाँ फायेदा न हो वहां हम न जाते है,और बिना फायेदे के न हम जागते है| सो मेरे मित्रों कहने का मतलब ये है की आजकल फायेदे के सौदे में हम व्यस्त थे इसलिए ही आप सबसे दूर थे|
"कहियेगा कैसी कही"