Thursday, January 31, 2013

आम  आदमी 

हालात बदलेंगे हम ये संभावना रखते है
उम्मीदे टूटी है पर,हौसला तमाम रखते है 

कभी न कभी  वह दिन भी आएगा 
जब उजाला खुद उजाला मांगने आएगा 

लोगों के नज़रिए की हमें परवाह नहीं 
आँखों में अपनी हम रवानी रखते है 

हजारों की भीड़ में है शामिल, लेकिन 
`आम आदमी' की पहचान रखते है ।।

Wednesday, January 30, 2013

निर्भया तुम्हें सलाम .......

रात थी घनेरी 
सड़क थी अँधेरी 
नहीं थी अकेली।

 
साथ था मित्र 
बिलकुल सच्चरित्र 
समझ कर हालात 
बोला-
ना डर 
मै हूँ तेरे साथ 

तभी आवाज़ आयी 
बहन क्यों हो घबराई ?
तुम्हे जहाँ जाना है 
हमें भी वहीँ जाना है।


वह बैठ गई विश्वास पर 
स्वयं की ही लाश पर 
उसमे थे दरिन्दे,
गिद्ध नुमा परिंदे ।

नियत थी उनकी खोटी 
नोंचने लगे उसकी बोटी 
उलझ रही थी सांसे 
तार-तार थी पोशाके 

अश्रु लहु ,लहु अश्रु,
जीवन की गुहार 
ईश्वर से पुकार 
मदद मदद 
वह चिल्लाई-

कही से कोई आवाज़ न आई 
सब थे गूंगे बहरे 
साथ थी उसकी किस्मत 
लुटी हुई अस्मत 
केश थे खुले 
अरमाँ थे मरे 
धड़कन थी,पर चाह नहीं 
जीवन था पर आत्मा नहीं 

जो लड़ते- लड़ते मर गई 
कह दिया शहीद हो गई 
हे देश! कैसा है तेरा परिवेश? 
जो जीना चाहता है,
वो लड़कर मर जाता है।
और मरकर भी नाम अमर कर जाता है!!  

बदलना होगा !!!

मुश्किलें यही रही 
तो सोचना होगा,
अब और नहीं सहना होगा 
अब और नहीं सहना होगा!!

हमें तो बता दी गई 
हमारी सीमायें 
तुम्हे  भी अब हद में रहना होगा!!

मंजिल हमारी भी वही है,
जो तुम्हारी है,
तुम्हे ही अपना ढंग बदलना होगा!!

हमें तो लगता है,अब 
आ गया है फैसले का वक़्त 
ग़र बदलना ही है,तो बस 
अपना रास्ता बदलना होगा 
अब और नहीं सहना होगा!! 


Monday, January 28, 2013

बिटिया की कलम से .........

स्वप्न यूँ  बिखर गए,
अश्रु बनकर बह गए ,
हम राह देखते रहे,
वे मौन व्रत लिए रहे ।

कोई  ना था पास तब,
जीने की मुझमे चाह तक,
वस्त्र तार -तार हो गए ,
हम जार -जार रो पड़े ।

साँसों में भी तब जान थी ,
धड़कन की उसमे आस थी,
मोमबत्तियाँ हैरान थी,
जलने की उनमे चाह थी।

जो पिघल-पिघल कह गई
 दास्ताने-जुर्म की,
आवाम ने आवाज़ दी ,
अब और नहीं! और नहीं !

होगा शहीद इस तरह,
मिल करके आज ये कहे,
बेटी है गौरव देश की,
पत्नी और जननी वही,

जीने का उसे अधिकार दो!
उसे उसका संसार दो!
यहाँ मान को सम्मान दो!
अब राह,देखेंगे नहीं ।

तुम मौन व्रत लिए रहो।
हम साथ देंगे नहीं !!!!!

Saturday, January 26, 2013

बिटिया बनाम हाशिया........

भारतीय इतिहास भले ही वीरांगनाओ की शौर्य गाथा से भरा हो। उसे देवी,शक्ति,दुर्गा,काली, कुछ भी कहा गया हो, परन्तु ये भी कटु सत्य है कि तमाम कोशिशो और सामाजिक विकासो के बावजूद भी उसे हाशिये पर ही रक्खा जाता है क्यों? क्यों जन्म लेने से पूर्व ही बच्चियों को मार देने की प्रथा बदस्तूर जारी है? एक खोज के अनुसार-' कन्या भ्रूड़ हत्या'भारत में आज भी चली आ रही है।उम्मीदों के विपरीत कन्या हत्या कम होने के बजाये कुछ दशको से बढ़ती ही जा रही है।

निजी बात पर आधारित एक शोध (45 मिलियंस दौतर्स मिसिंग) के अनुसार -जब लड़के का जन्म होता है तो औरते थाली बजाकर या हवा में आग उछाल कर उसके जन्म की घोषणा करती है। लेकिन यदि परिवार में बेटी पैदा हो जाये तो परिवार की बुजुर्ग औरत जाकर परिवार के पुरुषो से पूछती है कि -'बारात रखनी है या लौटानी है'।अगर आदमी ये जवाब देता है कि 'लौटानी है'। तो सारे पुरुष चले जाते है और तब जच्चा माँ को नन्ही बेटी के मुहँ में तम्बाकू रखने को कहा जाता है। जच्चा माँ के विरोध का मतलब है,उसकी जान को खतरा या उसे घर से निकाले जाने की धमकी।

सोचिये और विचार भी कीजिये की इसका जिम्मेदार कौन?मै तो कहती हूँ ये एक सोची समझी साजिश है जिसकी नीति के तहत बेटियों को हाशिये पर सरकाया जा रहा है।उनकी सत्ता को मिटाया जा रहा है।प्रश्न गंभीर है कि एक ऒर जहां देश में जातिगत,धार्मिक,सामुदिक,दंगों में कत्लेआम खुलेआम होता है वही दूसरी    ऒर शिक्षा विकास के बावजूद भी इसे गुप्त रूप से लोग कर रहे है, और शायद वे ये सोच रहे है कि परिवार को संतुलित करने का यही एक कारगर तरीका है-'बेटा बचाओ -बेटी हटाओ'।अगर मै गलत नहीं हूँ तो आप ही बताइए की क्या ये सच नहीं कि कई साल पहले जब हम तकनीकि रूप से इतने विकसित नहीं थे। बच्चियों को तो हम तब भी मार देते थे। आज जब हम शिक्षित है तो दो कदम आगे है। हम अल्त्रासौन्द कराकर यह पहले ही जान लेते है कि गर्भस्थ शिशु क्या है? शिशु का लिंग पता चलते ही हम उसे रखने या गिराने का फैसला ले लेते है क्या ये न्याय संगत है? या भविष्य में होगा। मै पूछती हूँ कब मिटेगा ये हाशिया?
उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध लोकगीत है-
प्रभुजी! मै तोरी विनती करूँ, पैयाँ पडूं बार-बार,
अगले जन्म मोहि बिटिया न दीजो, नरक दीजो डार ।
सुनने में यह भले ही मर्मस्पर्शी लगता हो परन्तु इतना तो  स्पष्ट कर देता है की बेटियां बोझ है-आर्थिक बोझ -
उनके रहन-सहन,खानपान,शिक्षा-दिशा,विवाह-दहेज़। एक पुरानी कहावत है कि -'बेटियों को पालना ऐसा है जैसे पड़ोसियों के बागीचे में पानी देना' कितना दुखद है ये कथन और शर्मशार कर देने वाला भी- की जो जननी है उसका जिम्मेदार कौन? पिता ? पति ?या ससुराल ? दुःख ? दहेज़ और अभिशप्त जीवन।
सोचिये अगर सामाजिक रीतिरिवाज एक माँ-बाप को यदि बेटी जन्म की खुशी नहीं देते तो हम क्या आशा रक्खे कि यही समाज आगे चलकर बिटिया को हाशिया नहीं समझेगा?
मै थी 
तुम्हारे अन्दर 
सांस और 
जीवन बनकर 
सुन भी 
न पाई थी 
अपनी धड़कन 
कतरा-कतरा 
कर दिया मेरा जीवन !!! 


नर से बड़ी है नारी

द्विवोप्पत्ति:द्व्याय्त्त्वात्सम्बन्धस्य।।55।।

सब सम्बन्ध दो या दो से अधिक वस्तुओ के बीच होते है।(वेदान्तसूत्र के अनुसार ) आचार्य पाड़ीनी के अनुसार दो वस्तुऒ के निकटतम आने का नाम संयोग है। एक वस्तु के बीच संहिता या सम्बन्ध की कल्पना नहीं की जा सकती ।जैसे पिता -पुत्र ,स्वामी -सेवक,राजा -प्रजा,बहिन-भाई,ज्येष्ठ-कनिष्ठ पति-पत्नी आदि जितने भी सम्बन्ध है -सबके लिए कम से कम दो सत्ताऒ का होना अपेक्षित है। और दोनों सम्बन्ध सृष्टि के आरम्भ से एक  दूसरे के पूरक है।तो  फिर प्रश्न उठता है क़ि क्या जैविकीय आधार पर नर-नारी में भेद मान कर ही उसमे भेद किया जाता है और बड़ी ही सहजता से उसे ही उसके अधिकारो से वंचित कर दिया जाता है।मै पूछती हूँ क्यों? प्रश्न शोचनीय ही नहीं विचारनिए भी है,कि पुरुष को जन्म देने वाली नारी को एक प्रसिद्ध दार्शनिक ने "अपूर्ण पुरुष" की संज्ञा  देते हुए कहा कि  "स्त्रियाँ कुछ निश्चित गुणों के अभाव में स्त्रियाँ है।"अब समझना ये है की यहाँ  कौन से गुणों की बात कही गई? और गुणों के कम या ज्यादा होने से भेद-भाव का प्रश्न कहा से उत्त्पन  हुआ? और यदि मान भी ले की स्त्रियों में कम गुण होते है तो भी स्त्री पुरुष कैसे हो सकती है? वो भी है अपूर्ण। अगर वैदिक मान्यता पर दृष्टिपात करे तो आप स्वयं पाएंगे कि वहां बिना पार्वती के शंकर जी अधूरे है। कहने का तात्पर्य ये है कि नारी शक्ति केबिना 'शिव भी शव के समान है'। उसी प्रकार से  सीता बिना राम,लक्ष्मी बिना विष्णु जी, तो फिर अधूरा यानि अपूर्ण कौन?


मान लिया जाये कि यही बात आप पुरुष के सन्दर्भ में भी कह सकते है तो भी मै यही कहूँगी कि दोनों एक दूसरे के पूरक है और दोनों  स्वतन्त्र सत्ता। जब दोनों का ही स्वतन्त्र अस्तित्व है तो ज़ाहिर सी बात है दोनों के अधिकार भी स्वतंत्र होंगे तो मै पूछती हूँ कि ये कौन तय करेगा की ये तुम्हरा है,ये हम्ह्रारा,तुम्हारी सीमा घर की चार दीवारी है और मेरी खुला आसमान,अगर मै कमाऊंगा तो तुम बच्चो की परवरिश करोगी,मै देर रात घर से बाहर रह सकता हूँ तुम नहीं तुम औरत हो तुम अबला हो मै ही तुम्हारा संरक्षक हूँ और मै ही तुम्हारा भक्षक मै जो चाहू कर सकता हूँ तुम नहीं क्योकि तुम नारी हो और केवल पुस्तको में,साहित्य में,इतिहास में,ही भारी हो।ऐसा कह कर उसे दबाया जाता है,रास्ता दिखाने के बहाने रास्ता भटकाया जाता है।मै कहती हूँ कब तक।अब वो दिन दूर नहीं जब सतयुग वापस आएगा आदि शक्ति कहलाने वाली नारी जब दुर्गा और काली का रूप लेगी तब दो नहीं एक की ही सत्ता रहेगी।