Monday, February 25, 2013

मुझे यकीन है !

मुझे यकीन है कि .........
अब चुप नहीं रहोगे 
बात पूरी किये बिना 
कुर्सी से नहीं उठोगे !

तुमने देखा था जो सपना 
जो पूरी तरह था,तुम्हारा अपना 
वह सपना अभी अधूरा है 
तुम्हारा लक्ष्य नहीं पूरा है 

यह पूरा होगा तभी 
जब तुम कुछ कहोगे कभी 
अब तो मौन तोड़ो 
राहों को यूँ न मोड़ो 

राहें है पूर्णतया सही 
बस,एक सख्त कदम बढाओ  अभी 
तुमको अंदाज़ा नहीं है ,अपनी शक्ति का 
अन्तर्मन में दबी अग्नि का


तुम्हे अभी अपनों से लड़ना है 
मन के रिश्तों को जोड़ना है 
दिल के रिश्ते टूटेंगे जभी 
एक नई रचना होगी तभी .................................   

Thursday, February 14, 2013

अनुभव

जब तुम अनुभव करते हो 'तुम कोई नहीं'तब तुम अनुभव करते हो 'तुम कुछ नहीं',जब तुम अनुभव करते हो तुम कुछ नहीं, तभी तुम्हे लगता है कि अभी तुममे कुछ बाकी  है जानने और सीखने के लिए। तब तुम  देखते हो और सोचते हो कि धीरे-धीरे सब कुछ सरल और सहज हो जाता है खुद को जानने और समझने के लिए।तब तुम धीरे-धीरे सब कुछ सीखने लगते हो।अज्ञान के अंधकार से निकल कर ज्ञान के प्रकाश की ओर अग्रसर होने लगते हो और तभी अचानक से पर्त दर पर्त कुछ खुलता जाता है ठीक वैसे ही जैसे गहन उदासी के बाद ख़ुशी की कोई किरण दिख जाये या यूँ कह लीजिये की कई दिनों की घोर मूसलाधार बारिश के बाद सूर्य भगवान के दर्शन हो जाए, या घना कोहरा छंट जाये। मन मस्तिष्क के द्वार कुछ उसी प्रकार खुल जाते है और तब तुम अनुभव करने लगते हो की 'तुम कुछ हो'। हाँ! यह भी हो सकता है कि कभी कोई नकारात्मक विचार तुम पर प्रभा-हो जाये और तुम स्वयं को उसकी गिरफ्त में पाकर असहाय महसूस करो लेकिन याद रखो जैसे दिन के बाद रात और 
रात के बाद दिन आता है वैसे ही  सकारात्मक सोंच तुम्हें स्वयं प्रेरित करती है आगे बढ़ने के लिए और तभी सब कुछ सुलभ हो जाता है।तब तुम अनुभव करते हो की जैसेकोई तुम्हारा  भाग्य खट खटा रहा हो।  अनुभव

Saturday, February 9, 2013

सीख.........

बच्चा जब छोटा होता है, सीख माँ देती है। बड़ा होता है तो घर परिवार आस-पड़ोस (कल्चर-संस्कृति) से सीखता है। जब विद्यालय जाता है तो गुरु की सीख  उसका मार्गदर्शन करती है, यदि बच्चा माता-पिता या गुरु की सीख को अपना आदर्श  मानकर उनके बताये पदचिन्हों पर चलता  है तो निसंदेह उसका  जीवन सफल हो जाता है। वहीं दूसरी ओर यदि वो  बुरी संगत या बुरे व्यक्तित्व से प्रभावित हो गया तो ज़रा भी देर नहीं लगती उसके लिए बड़ो का मान-सम्मान,आदर-सत्कार जैसे शब्द बेईमानी हो जाते है और वह गर्त में गिरता जाता है इसलिए बच्चो को चाहिए कि वो  अपने बड़ो की इज्ज़त करे, शिष्टाचार का सही अर्थ समझे क्योंकि ............बड़े कभी बच्चो का बुरा नहीं सोचते उनकी आँखों में हमेशा बच्चो के सुन्दर भविष्य का सपना होता है।

इसलिए बच्चो को चाहिए की  वे बड़ो की दी सीख को अपनाये। गुरु की सीख को आदर्श माने और माँ पिता की सीख को जीवन में उतार कर न केवल संस्कारवान बने बल्कि चरित्रवान बने।




Tuesday, February 5, 2013

सीमा-रेखा

(एक और परिप्रेक्ष्य में -)
सुनो!सुनो!सुनो!
कहानी सुनो!
एक की नहीं,दो की नहीं,
अनेक बेटियों की
सुनो!सुनो!सुनो!

(सामूहिक -पुरुष )
हमारे तुम्हारे 
कितने भी मतभेद है 
पर इस बात पर 
हम सब एक है 
कि हमारी जो संस्कृति है,
वह सबसे महान है,
उसमे नारी का ऊँचा स्थान है।

बोलो!बोलो! है न!
हाँ!हाँ!
वह घर की लक्ष्मी है,
उसका काम है,वह घर संभाले 
चार दीवारी के भीतर फैलाए उजाले 
घर उसकी मर्यादा रेखा है 
घर उसकी मर्यादा रेखा है।

(सामूहिक -लडकियाँ )
पर क्या आपने देखा है?
मर्दों की भी कोई सीमा-रेखा है?
क्यों बेटियाँ ही हर दुःख सहें ?
क्यों कुरीतियों की बलि चदे ?

जब सुख और दुःख में 
जीवन और मरण में,
हमारा बराबरी का हिस्सा है 
तो फिर भेद-भाव का क्या किस्सा है?

(कुछ लडकियाँ आगे आकर )
हाँ!हाँ!भेद-भाव का क्या किस्सा है?
क्यों?बेटी होने का बोझ
 हमें आज भी सालता है 
मेरा ही घर मुझे आज क्यों  काटता है?
क्यों?अपने ही घर में आज असुरक्षित हूँ,
एक पल जीने के लिए,
पल-पल तरसती हूँ।
(सुना आपने ! सुना आपने)

कल तो हद हो गई,
एक और बेटी दरिंदों 
का शिकार हो गई।

(सामूहिक )-
देश हुआ शर्मसार 
बेटियों पर हो रहे अत्याचार 
16 दिसंबर की वो काली रात 
जब फिर एक बेटी ने गंवाई अपनी जान .....

कब तक नारी अपमान सहे ?
ज़िल्लत की ज़िन्दगी जिए 
अपना हक़ पाने के लिए 
जीवन से लड़कर मरे 

इसलिए अब और भी जरुरी है 
लानी हमें  बराबरी है 
लानी है हमें  समता 
वरना ढूंढते रह जाओगे 
प्यार,स्नेह और ममता 

जब समाज ही बंधन गढ़े   
सरकार का मुँह बंद रहे  
तब सही कानून ,सही तरीके से  
,हित में लागू कौन करे?
बंद करनी होगी अब पुरुषो को ,अपनी मनमानी 
नहीं सहेंगी बेटियाँ अब उनकी तानाशाही 

क्या पहनना है?कैसे पहनना है?
क्या गाना है ,क्या बजाना है?
ये वो निर्धारित करेंगे 
हमसे हमारे जीने के अंदाज़ छीन लेंगे 
कहते है गाना बजाना बंद करो,नहीं तो 
मार डालेंगे!

हमे डर इस बात का नहीं है 
कि हममे कम शक्ति है 
हमें  अपने अन्दर का प्रकाश डराता  है 
जहाँ से तुम्हारा वजूद बौना नज़र आता है।

हम कहते है -
बात हाथ से न निकल जाए 
बेहतर है कि संभल जाए 
प्यार,इंसानियत और बराबरी 
से रहना सीख जाएं 
इतिहास स्वयं को दोहराता है 
ग़ुलाम बनाने वाला 
खुद ग़ुलाम बन जाता है!!!







 

Sunday, February 3, 2013

सीमा-रेखा.......

सुनो! सुनो! सुनो!
कहानी सुनो!
भारत की बेटियों की 
एक की नहीं,दो की नहीं,
असंख्य दामिनियो/ बेटियों की .........
सुनो!सुनों!सुनों!

एक पुरुष -(हँसते हुए )भले ही ,
हमारे तुम्हारे 
कितने भी मतभेद है 
पर इस बात पर 
हम सब एक है कि 
हमारी जो संस्कृति है,
वह सबसे महान है,
उसमे नारी का ऊँचा स्थान है।

बोलो! बोलो! है ना,
सब-(पुरुष एक साथ ) हाँ! हाँ!
वह घर की लक्ष्मी है,
उसका काम है,वह घर संभाले 
चार दीवारी के भीतर फैलाये उजाले ।
घर उसकी मर्यादा रेखा है 
घर उसकी मर्यादा रेखा है ।  

सब लडकियाँ-( एक साथ ).....
पर क्या आपने कभी देखा है?
मर्दों की भी कोई सीमा-रेखा है?
क्यों बेटियाँ ही हर दुःख सहें ?
क्यों कुरीतियों की बलि चढ़े ?

आइये !मेरे साथ आइये !
लक्ष्मी की कहानी,उसकी जुबानी सुनिए!
सूत्रधार-( डुगडुगी  या थाली कुछ भी बजाते हुए)
हाँ! हाँ! आइये! आइये!
पुरुष-1-सुनिए काहे ! देखिये भी!
(तभी एक लड़का एक लड़की को अपनी ऒर खींचेगा, दुप्पट्टा खींचेगा और धकेल देगा ......)
लड़की रोते हुए-
मै लक्ष्मी हूँ,
घर ,परिवार के बोझ से दबी हूँ।
भाई-बहन छोटे है,
खाने के टोटे है,
बापू दारु पीते है 
और बात-बात पर पीटते है 
नशे में लडखडा कर जब घर आते है 
हम डर कर सिहर जाते है,
बेटी होने का बोझ  हमें सालता है,
मेरा ही घर मुझे काटता है,
कल तो हद हो गई,
चंद रुपयों के लिए मेरी अस्मत लुट गई .......


(सब एक साथ )-
देश हुआ शर्म सार 
बेटियों पर हो रहे अत्याचार 
16 दिसंबर की वो काली रात 
जब एक और बेटी ने गंवाई अपनी जान .....

(कुछ लडकियाँ एक साथ )-हाँ !हाँ!
कब तक मर्द करेंगे अपनी मनमानी?
कब तक स्त्रियाँ सहेंगी उनकी तानाशाही?

(तभी भीड़ से आवाज़ आती है ......)
एक महिला-
मै एक कामकाजी महिला हूँ,
मेट्रो में सफ़र करती हूँ (कह कर अपना दुप्पट्टा हटा कर दिखाती है)
मेरे जिस्म पर ये जो नाख़ून गड़े है,
ये गिरगिट नुमा गिद्ध के पंजे है,
मेरी आत्मा को कचोटती 
उन मर्दों की आँखे है,
दुस्शासन की भुजाएं है 
जिनसे वह रोज़ न जाने 
कितने चीर हरण करता है ।
क्या उसके लिए बनी कोई सीमा-रेखा है?(चीखते हुए बोलती है )


(लडकियाँ एक साथ)
 .......हाँ!हाँ! कोई सीमा-रेखा है?
हमारे कपडे ........हमारा खाना 
हमारा गाना .......हमारा बजाना 
क्यों नहीं तुम्हें भाता है?
हमें सताकर बोलो?
क्या मज़ा आता है ?
कहते हो गाना-बजाना बंद करो 
नहीं तो मार डालेंगे 
सोंच लो !
अगर अब नहीं सुधरे तो हम सुधार देंगे 
तुमसे तुम्हारी पहचान छीन लेंगे!
नारी है शक्ति का अवतार 
यही है भारत के संस्कार !!!
यही है भारत के संस्कार
 


Saturday, February 2, 2013

लक्ष्मण-रेखा

 

क्या पहनना है?
कब पहनना है?
क्या खाना है?
कहाँ जाना है?

कब तक आना 
कब तक रहना है?
जो करना है 
जब करना है ।

मुझे बताना होगा 
पर, बिना मुह खोले 
सब सहना होगा 
हम जो बोले वो 
सुनना होगा 

अगर बोला ,मुह खोला
तो बहस मान ली जाएगी 
तुम्हारे हिस्से की ख़ुशी 
छीन ली जाएगी।

तुम्हे वही करना होगा 
जो मै कहूँगा,
वही बोलना होगा,
जो मै सुनूंगा 

तुम्हारे हिस्से की हंसी 
मेरी हंसी में है 
तुम्हारी किस्मत 
मेरी मुट्ठी में है।

तुम सपने भी देखोगी 
तो मेरी आँखों से,
जागोगी और सॊऒगी 
तो मेरी आँखों से,

मेरे बिना तुम्हारा वज़ूद नहीं 
`मै' ही मैं हूँ 
तुम कुछ नहीं 
याद रखना-
सागर के पार 
अनंत आकाश का 
जहाँ तक है विस्तार 
इस पार से उस पार 
यदि देखा-
`मिलेगी तुम्हे लक्ष्मण-रेखा'

 

Friday, February 1, 2013

लेटेस्ट सोंच

वो कहते है तुम्हें सोचना होगा
सोचने के लिए लिखना होगा
इसी सोंच विचार में हम डूबे रहे
क्या लिखे ये सोचते रहे !!!


सोचा पहले सोंचे या पहले लिखे
बिना सोचे लिखे या सोचकर लिखे
इसी उहापोह में सोचने लगे
की विश्वरूप पर लोग ये क्या कह गए
लोगो की सोंच जान कर हम डर गए !!!