Saturday, January 26, 2013

बिटिया बनाम हाशिया........

भारतीय इतिहास भले ही वीरांगनाओ की शौर्य गाथा से भरा हो। उसे देवी,शक्ति,दुर्गा,काली, कुछ भी कहा गया हो, परन्तु ये भी कटु सत्य है कि तमाम कोशिशो और सामाजिक विकासो के बावजूद भी उसे हाशिये पर ही रक्खा जाता है क्यों? क्यों जन्म लेने से पूर्व ही बच्चियों को मार देने की प्रथा बदस्तूर जारी है? एक खोज के अनुसार-' कन्या भ्रूड़ हत्या'भारत में आज भी चली आ रही है।उम्मीदों के विपरीत कन्या हत्या कम होने के बजाये कुछ दशको से बढ़ती ही जा रही है।

निजी बात पर आधारित एक शोध (45 मिलियंस दौतर्स मिसिंग) के अनुसार -जब लड़के का जन्म होता है तो औरते थाली बजाकर या हवा में आग उछाल कर उसके जन्म की घोषणा करती है। लेकिन यदि परिवार में बेटी पैदा हो जाये तो परिवार की बुजुर्ग औरत जाकर परिवार के पुरुषो से पूछती है कि -'बारात रखनी है या लौटानी है'।अगर आदमी ये जवाब देता है कि 'लौटानी है'। तो सारे पुरुष चले जाते है और तब जच्चा माँ को नन्ही बेटी के मुहँ में तम्बाकू रखने को कहा जाता है। जच्चा माँ के विरोध का मतलब है,उसकी जान को खतरा या उसे घर से निकाले जाने की धमकी।

सोचिये और विचार भी कीजिये की इसका जिम्मेदार कौन?मै तो कहती हूँ ये एक सोची समझी साजिश है जिसकी नीति के तहत बेटियों को हाशिये पर सरकाया जा रहा है।उनकी सत्ता को मिटाया जा रहा है।प्रश्न गंभीर है कि एक ऒर जहां देश में जातिगत,धार्मिक,सामुदिक,दंगों में कत्लेआम खुलेआम होता है वही दूसरी    ऒर शिक्षा विकास के बावजूद भी इसे गुप्त रूप से लोग कर रहे है, और शायद वे ये सोच रहे है कि परिवार को संतुलित करने का यही एक कारगर तरीका है-'बेटा बचाओ -बेटी हटाओ'।अगर मै गलत नहीं हूँ तो आप ही बताइए की क्या ये सच नहीं कि कई साल पहले जब हम तकनीकि रूप से इतने विकसित नहीं थे। बच्चियों को तो हम तब भी मार देते थे। आज जब हम शिक्षित है तो दो कदम आगे है। हम अल्त्रासौन्द कराकर यह पहले ही जान लेते है कि गर्भस्थ शिशु क्या है? शिशु का लिंग पता चलते ही हम उसे रखने या गिराने का फैसला ले लेते है क्या ये न्याय संगत है? या भविष्य में होगा। मै पूछती हूँ कब मिटेगा ये हाशिया?
उत्तर भारत का एक प्रसिद्ध लोकगीत है-
प्रभुजी! मै तोरी विनती करूँ, पैयाँ पडूं बार-बार,
अगले जन्म मोहि बिटिया न दीजो, नरक दीजो डार ।
सुनने में यह भले ही मर्मस्पर्शी लगता हो परन्तु इतना तो  स्पष्ट कर देता है की बेटियां बोझ है-आर्थिक बोझ -
उनके रहन-सहन,खानपान,शिक्षा-दिशा,विवाह-दहेज़। एक पुरानी कहावत है कि -'बेटियों को पालना ऐसा है जैसे पड़ोसियों के बागीचे में पानी देना' कितना दुखद है ये कथन और शर्मशार कर देने वाला भी- की जो जननी है उसका जिम्मेदार कौन? पिता ? पति ?या ससुराल ? दुःख ? दहेज़ और अभिशप्त जीवन।
सोचिये अगर सामाजिक रीतिरिवाज एक माँ-बाप को यदि बेटी जन्म की खुशी नहीं देते तो हम क्या आशा रक्खे कि यही समाज आगे चलकर बिटिया को हाशिया नहीं समझेगा?
मै थी 
तुम्हारे अन्दर 
सांस और 
जीवन बनकर 
सुन भी 
न पाई थी 
अपनी धड़कन 
कतरा-कतरा 
कर दिया मेरा जीवन !!! 


नर से बड़ी है नारी

द्विवोप्पत्ति:द्व्याय्त्त्वात्सम्बन्धस्य।।55।।

सब सम्बन्ध दो या दो से अधिक वस्तुओ के बीच होते है।(वेदान्तसूत्र के अनुसार ) आचार्य पाड़ीनी के अनुसार दो वस्तुऒ के निकटतम आने का नाम संयोग है। एक वस्तु के बीच संहिता या सम्बन्ध की कल्पना नहीं की जा सकती ।जैसे पिता -पुत्र ,स्वामी -सेवक,राजा -प्रजा,बहिन-भाई,ज्येष्ठ-कनिष्ठ पति-पत्नी आदि जितने भी सम्बन्ध है -सबके लिए कम से कम दो सत्ताऒ का होना अपेक्षित है। और दोनों सम्बन्ध सृष्टि के आरम्भ से एक  दूसरे के पूरक है।तो  फिर प्रश्न उठता है क़ि क्या जैविकीय आधार पर नर-नारी में भेद मान कर ही उसमे भेद किया जाता है और बड़ी ही सहजता से उसे ही उसके अधिकारो से वंचित कर दिया जाता है।मै पूछती हूँ क्यों? प्रश्न शोचनीय ही नहीं विचारनिए भी है,कि पुरुष को जन्म देने वाली नारी को एक प्रसिद्ध दार्शनिक ने "अपूर्ण पुरुष" की संज्ञा  देते हुए कहा कि  "स्त्रियाँ कुछ निश्चित गुणों के अभाव में स्त्रियाँ है।"अब समझना ये है की यहाँ  कौन से गुणों की बात कही गई? और गुणों के कम या ज्यादा होने से भेद-भाव का प्रश्न कहा से उत्त्पन  हुआ? और यदि मान भी ले की स्त्रियों में कम गुण होते है तो भी स्त्री पुरुष कैसे हो सकती है? वो भी है अपूर्ण। अगर वैदिक मान्यता पर दृष्टिपात करे तो आप स्वयं पाएंगे कि वहां बिना पार्वती के शंकर जी अधूरे है। कहने का तात्पर्य ये है कि नारी शक्ति केबिना 'शिव भी शव के समान है'। उसी प्रकार से  सीता बिना राम,लक्ष्मी बिना विष्णु जी, तो फिर अधूरा यानि अपूर्ण कौन?


मान लिया जाये कि यही बात आप पुरुष के सन्दर्भ में भी कह सकते है तो भी मै यही कहूँगी कि दोनों एक दूसरे के पूरक है और दोनों  स्वतन्त्र सत्ता। जब दोनों का ही स्वतन्त्र अस्तित्व है तो ज़ाहिर सी बात है दोनों के अधिकार भी स्वतंत्र होंगे तो मै पूछती हूँ कि ये कौन तय करेगा की ये तुम्हरा है,ये हम्ह्रारा,तुम्हारी सीमा घर की चार दीवारी है और मेरी खुला आसमान,अगर मै कमाऊंगा तो तुम बच्चो की परवरिश करोगी,मै देर रात घर से बाहर रह सकता हूँ तुम नहीं तुम औरत हो तुम अबला हो मै ही तुम्हारा संरक्षक हूँ और मै ही तुम्हारा भक्षक मै जो चाहू कर सकता हूँ तुम नहीं क्योकि तुम नारी हो और केवल पुस्तको में,साहित्य में,इतिहास में,ही भारी हो।ऐसा कह कर उसे दबाया जाता है,रास्ता दिखाने के बहाने रास्ता भटकाया जाता है।मै कहती हूँ कब तक।अब वो दिन दूर नहीं जब सतयुग वापस आएगा आदि शक्ति कहलाने वाली नारी जब दुर्गा और काली का रूप लेगी तब दो नहीं एक की ही सत्ता रहेगी।   
  


Monday, November 29, 2010

अक्सर

अक्सर मेरे साथ कुछ एसा होता है जैसा शायद आपके साथ भी होता हो या न भी होता हो ,
पर मेरे साथ तो जरुर होता है हम जो भी कहते है उसे समझने वाले कुछ और समझ लेते है और उसका सन्दर्भ -
प्रसंग अलग करके मतलब कुछ और ही निकाल लेते है और हम जो कहना चाहते है हो कुछ और जाता है है और "बन जाता है
बिन बात का बतंगड़ " आजकल भावनाओ को कोई समझता ही नहीं | अब लोगो को कैसे समझाए की अगर उनकी समझ और इनकी समझ
हमारी समझ और तुमाहरी समझ एक होती तो लाइफ इतनी बोरिंग नहोती ,इसीलिये शायद किसी ने कहा होगा की समझ समझ से समझ को
समझो समझ समझ ही खुद एक समझ है ,समझ समझ को जो न समझे मेरी समझ में वो नासमझ है

Saturday, November 27, 2010

चहरे

अजी हमने कही और आपने सुनी, सुनी तो ठीक और न सुनी तो भी ठीक,
और वैसे भी" हम आपके है कौन"? अगर आप भी गांधी जी के बन्दर के एक ख़ास बन्दर है, जो सुनता नहीं तो कोई बात नहीं, कम स कम पढ़ ही लीजिये
हम तो जनाब बहुत पढ़ते है नहीं पढ़ पाते तो एक चीज़ नहीं पढ़ पाते | अरे! आपने पूछा नहीं क्या ? तो लीजिये जनाब हम खुद ही बता देते है
चेहरा हाँ जी चेहरा
अगर चेहरा पढना जानते तो फसबुक पर समय जाया क्यों करते? अब ये न पूछिएगा की हमने ऐसी क्यों कही पर खुदा कसम जो भी कही सौ फीसदी सच्ची
कही क्योकि जितनी जल्दी गिल्गितान भी रंग नहीं बदलता होगा ये अपना ढंग भी बदल लेते है और तो और जीने का ढंग भी बदल लेते है | तिलक ये जब भी
लगाते है माथा देख कर ही लगाते वरना लगाते ही नहीं| अपने बचपने में वर्णमाला सीखते समय इनोहने स-से -सच कभी नहीं सीखा होगा ये बात हम दावे के साथ
कह सकते है |कहने को तो बहुत ही सीधे साधे तरीके से हम ये "फ़िल्मी गाना की एक ----------- पर कई ----------- लगा लेते है लोग | गा कर भी अपनी भडास
निकल सकते थे पर क्या करे पढने से मजबूर है शायद इसीलिये लिखने से भी इसलिए आपके लिए भी होमवर्क छोड़ जाते है की ऊपर लिखी पंक्तियों में सही शब्द
भरो |

Tuesday, November 23, 2010

खेल-खेल-में..

खेल-कूद प्रतियोगिता यानि-स्पोर्ट्स-डे-यानि मनोरंजन का एक स्वस्थ साधन या व्यायाम -व्यायाम और खेल-कूद आपस में कितने सम्बंधित है,यह बात तो सभी जानते है,परन्तु एक बात समझनी है क्या वास्तव में व्यायाम करते वक़्त हम खेलते है? या प्रतियोगिता करते समय हम स्वस्थ होते है? और एक बात मेरे जहन में आती है वो यह कि स्वस्थ रहेने और मनोरंजन करने या खेलने -कूदने का यदि घनिष्ठत रिश्ता है
तो यह जानना जरुरी है कि यह "यह रिश्ता क्या कहलाता है?" केवल मनोरंजन या व्यायाम या खेल-कूद क्या??? हाँ मुझे लगता है कि अगर इनमे से प्रतियोगिता शब्द को हटा दें तो यह मनोरंजन का साधन हो सकता है| एक दूसरी बात और है और वो यह है कि प्रतियोगिता क्या है? और क्यों बनी? और बात- बात पर प्रतियोगिता?? चाहे वाद-विवाद प्रतियोगिता हो या काव्य-पाठ प्रतियोगिता हो या वार्षिक खेल-कूद प्रतियोगिता हो | इस प्रतियोगिता ने तो प्राण ही ले लिए मनोरंजन तो गया प्रतियोगिता करने ,अब कहे का खेल और कहे का कूद? इस प्रतियोगिता संस्कृति ने पारिवारिक प्रथा को तोड़ा हा? क्यों कासी कही???

Saturday, November 20, 2010

taza khabar

अभी अभी ऍफ़ एम् पर गाना बज रहा था "जोर का झटका हाई जोरों से लगा" गाना बहुत अच्छा है और सुन कर झटका तो लगता है पर जोर से नहीं| मुझे याद है कुछ इसी तरह का एक और गाना पहले खूब चला
था "जोर का झटका हाई धीरे से लगा" मै दोनों गानों का मूल्यांकन करती हूँ तो पाती हूँ की जोर झटका धीरे से ही लगता है, क्योंकि जोर का झटका अगर जोरों से लगता होता तो कुछ वैसा नहीं होता जैसा बताया गया है|" सब कुछ करने के बाद जब जागे तो काहे का झटका और काहे का जोर" यह थी आज की ताज़ा खबर

Tuesday, November 16, 2010

ALFAAZ

मुद्दतों बाद आज मेरे अलफ़ाज़ जागे है, दिल में कुछ कहने के बहाने जागे है!
क्या हुआ जो देर से आये जब जागे है ,दुरुस्त ही जागे है!!
प्यारे मित्रों !
एक बार फिर आप सभी पाठकों को मेरा सलाम|
"जागो ग्राहक जागो" "जब जागो तभी सवेरा" "तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग ज़रा"
और भी न जाने कितने जुमले, कहावते, इत्यादि है| हम पढ़ते है, पढ़ाते है , जानते है और जनाते है लेकिन फिर भी अपनी आदत से बाज़ नहीं आते है|
हमने तो जैसे ठान ली है न जागे है, न जागेंगे, और न जागने देंगे,क्योंकि मेरा मानना ही की अगर जाग गए तो सारे अरमान भी जाग जायेंगे| बिला वजह की चिंता फिकर और वैसे भी जागने से क्या फायेदा?
जहाँ फायेदा न हो वहां हम न जाते है,और बिना फायेदे के न हम जागते है| सो मेरे मित्रों कहने का मतलब ये है की आजकल फायेदे के सौदे में हम व्यस्त थे इसलिए ही आप सबसे दूर थे|
"कहियेगा कैसी कही"